भीमराव अंबेडकर

भीमराव अंबेडकर (1891-1956) [Bhimrao Ambedkar] का जन्म 14 अप्रैल 1891 में एक मिलिट्री कैम्प में हुआ था। यह अपने माता-पिता की चौदहवीं संतान थे। बचपन में इन्हें प्यार से भिवा कहकर पुकारा जाता था। इनके पिता का नाम रामजी सकपाल और इनकी माता का नाम भीमाबाई था। डॉ० अम्बेडकर जी एक क्रांतिकारी व्यक्तित्व वाले व्यक्तियों में से थे।

बचपन से ही समाज में इनको भेदभाव का सामना करना पड़ा इन्होंने समाज के उद्धार हेतु अपने पूर्ण जीवन को समर्पित कर दिया। इन्होंने अपने जीवन में दलितों को उनके अधिकार दिलाने हेतु अनेकों कार्य किए साथ ही इन्होंने संविधान के निर्माण में भी अपनी अमूल्य भूमिका निभाई जिसमें इन्होंने दलितों को उनके अधिकार दिलाये।

भीमराव अंबेडकर की जीवनी Biography of Bhimrao Ambedkar

भीमराव अंबेडकर एक गरीब परिवार के व्यक्ति थे। बचपन से ही इन्होंने बहुत सारे कष्टों का सामना किया। 25 वर्ष की नोकरी करने के बाद 1894 में जब इनके पिता रिटायर हुए उस समय अछूतों को सेवानिवृत्त पेंशन देने का कोई प्रावधान नहीं था। जिस कारण रामजी सकपाल का परिवार आर्थिक तंगी में आ गया। उपर से उनकी माता का स्वास्थ्य भी खराब रहता था। भीमराव अंबेडकर ने अपने बचपन मे काफी कुछ देखा।

उन्होंने सामाजिक बुराइयों को खत्म करने हेतु अनेकों प्रयास किए। उन्हें आधुनिक समाज मे समाज सुधारक की संज्ञा दी जाती हैं। इससे भी महत्वपूर्ण भीमराव अंबेडकर संविधान के निर्माता के रूप में उभरे। संविधान के द्वारा इन्होंने अछूतों को उनके अधिकारों से अवगत कराकर उन्हें अनेकों अधिकार प्रदान करवाए। जिससे वह समाज में सर उठाकर अपना जीवन यापन कर सकें।

भीमराव अंबेडकर की शिक्षा Education of Bhimrao Ambedkar

भीमराव अंबेडकर

1. भीम की शिक्षा की शुरुआत सतारा से हुई, सर्वप्रथम यही से भीम ने शिक्षा ग्रहण की परंतु उन्हें यहाँ भेदभाव का सामना करना पड़ा। उन्हें स्कूल में स्वर्ण परिवार के छात्र अपने पास नही बैठने देते थे, बल्कि उन्हें तो कमरे के बाहर बैठना पड़ता था। यहाँ तक कि पीने का पानी भी वह तब पीते थे, जब स्वर्ण परिवार के बच्चे पानी पी लेते थे।

2. उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा इसी स्कूल से सम्पन्न की तत्पश्चात अपनी माध्यमिक शिक्षा पूर्ण करने हेतु उन्होंने बम्बई के प्रतिष्ठित विद्यालय एलफिंस्टन हाई स्कूल में प्रवेश लिया। इस विद्यालय में उन्होंने 4 वी कक्षा में प्रवेश लिया। वह पढ़ाई में बहुत अच्छे थे, उन्हें मेधावी छात्र की संज्ञा दी जा सकती हैं। वह स्कूली पुस्तकों के साथ-साथ अन्य पुस्तके पढ़ने कर भी काफी सौकीन थे। वर्ष 1907 में उन्होंने अपनी मेट्रिक की परीक्षा पास की।

3. बम्बई के सिटी हाईस्कूल के मुख्य अध्यापक अर्जुन केलुस्टर जिन्होंने भीम की उच्च शिक्षा में बेहद अहम भूमिका निभाई। यह एक विचारक के साथ-साथ एक समाज सुधारक भी थे। जिनके व्यक्त्वि का प्रभाव डॉ भीमराव अंबेडकर (Bhimrao Ambedkar) के जीवन मे पड़ा। 1910 में भीम इंटरमीडिएट की परीक्षा पास कर अछूतों के लिए एक नया कीर्तिमान रचा, वह उनके लिए प्रेरणा के स्रोत बनें।

4. उन्होंने इसी तरह अपनी पढ़ाई को आगे निरंतर जारी रखा और 1913 में इन्होंने स्नातक की परीक्षा भी पास कर ली जिसके पश्चात बड़ौदा महाराजा द्वारा मिली स्कोलरशिप की सहायता से उन्हें विदेश जाकर शिक्षा ग्रहण करने का अवसर प्राप्त हुआ। उन्होंने 1913 में न्यूयॉर्क में स्थापित कोलंबिया यूनिवर्सिटी में प्रवेश लिया। वहाँ का वातावरण भारत मे व्याप्त भेदभाव के वातावरण से काफी भिन्न था। वहाँ के वातावरण का असर उनके व्यक्त्वि एवं उनके विचारों में भी पड़ा। जिस कारण वह एक समाज सुधारक और स्वतंत्रता प्रेमी के रूप में उभरे।

5. भीमराव अंबेडकर Bhimrao Ambedkar वर्तमान में भी सबसे ज्यादा डिग्री प्राप्त करने वालों में से एक हैं। इन्होंने एम.ए, एम.एस. सी, डी. एससी, जैसी अनेकों डिग्रियां प्राप्त की। यह पढ़ाई के पीछे इतने पागल थे कि यह कर्ज लेकर पढ़ाई करने हेतु वापस लंदन चले गए। वहाँ धन की कमी होने के कारण इनके पास खाना खाने तक के पैसे नहीं होते थे, परंतु तब भी उन पुस्तकें ख़रीदते थे और खुद खाली पेट सो जाया करते थे।

भीमराव अंबेडकर की प्रसिद्ध पुस्तकें Famous books by Bhimrao Ambedkar

● अम्बेडकर ने अपने जीवन मे कई रचनाओं एवं किताबों की रचना की। वह एक बुद्धिजीवी व्यक्ति थे और अपने विचारों को लिखित रूप देकर वह अपने विचारों को अन्य व्यक्तियों तक भी पहुचाते रहते थे। अम्बेडकर की प्रसिद्ध और विख्यात पुस्तक (Thoughts on Pakistan) पाकिस्तान पर विचार 1940 के अंत में प्रकासित हुई।

● जिसमें अम्बेडकर ने सामाजिक बुराइयां को बंटवारे का कारण बताकर कटु वचनों के साथ सामाजिक बुराइयां और हकीकतो को प्रकट किया। अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक में अस्पष्ठ बंटवारे का समर्थन किया था। उनके अनुसार इस बंटवारे के कारण शांति कायम की जा सकती थी और सामाजिक भेदभाव को कम किया जा सकता था।

● अम्बेडकर मानवता प्रेमी थे, वह कट्टरपंथी धारणाओं एवं विचारधाराओं के कट्टर विरोधी थे।

● 1921 गुलामी के दौरान उनकी प्रकाशित पुस्तक ब्रिटिश भारत मे समाजवादी वित्त का विकेंद्रीकरण में भी उन्होंने अधिकारों से वंचित हिंदुओ के प्रति आवाज उठाई और गाँधी जी को सहयोग कर उनका मनोबल बढ़ाया। वह भेदभाव वाली धारणाओं को जमीनी स्तर से अच्छे से समझते थे, क्योंकि बचपन से ही पग-पग में उन्हें स्वयं भेदभाव का सामना करना पड़ा। जिस कारण उनकी हर एक पुस्तक में कही हद तक समानता देखने को मिलती हैं।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भीमराव अंबेडकर की भूमिका Bhimrao Ambedkar’s role in the Indian freedom struggle

अम्बेडकर शुरुआत से ही अंग्रेजी शाशन के विरोधियों में से एक थे, क्योंकि वह जानते थे, कि अंग्रेज हिंदुस्तानी नागरिकों के प्रति भेदभाव की नीति का पालन करते हैं। वह किसी भी व्यक्ति को जब भी भेदभाव पीड़ित देखते थे तो वह उसका सहारा बन जाया करते थे। वह स्वराज की मांग करते रहते थे और अपने क्रांतिकारी भाषणों के जरिये हिंदुत्ववादी विचारधारा को विकसित करते रहते थे।

वह ऐसे संविधान के निर्माण की बात करते थे, जो पूर्णतः भेदभाव रहित हो। उनका मानना था कि भेद-भाव को तक तक पूर्णतः खत्म नही किया जा सकता जब तक सत्ता उनके अर्थात दलित वर्गों की ना हो। उनके विचारों से गांधी जी और अनेकों स्वतंत्रता सेनानी काफी प्रेरित थे। अम्बेडकर समस्त देशवासियों एवं दलितों के लिए एक प्रेरणा के स्रोत थे।

अछूतों के प्रति भेदभाव को खत्म करने में अम्बेडकर की भूमिका Ambedkar’s role in ending discrimination against untouchables

भीमराव अंबेडकर अछूतों के अधिकारों की रक्षा करने वाले मसीहाओं में से एक थे। वह अपने पूर्ण जीवनभर अछूतों को अधिकार दिलाने के लिए निरंतर कार्य करते रहें और इसमें उन्होंने कही हद तक सफलता भी प्राप्त की। अपने इंग्लैंड दौरे पर उन्होंने दलित वर्ग के अधिकारों हेतु सांस्कृतिक,आर्थिक और धार्मिक अधिकारों की रक्षा करने हेतु “मौलिक अधिकारों का घोषणा पत्र” तैयार किया।

उन्होंने अपने जीवन भर के ज्ञान के आधार पर एक भावी संविधान की रूपरेखा तैयार की। उन्होंने भारत के दलित वर्ग के लिए ही नही अपितु विश्वभर में भेदभाव पीड़ित व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करने का उत्तरदायित्व उठाया। उन्होंने अपने समस्त भाषणों में दलितों पर हो रहे भेदभाव के प्रति अपनी आवाज उठाई।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारतीय संविधान के निर्माण में उनके अनेक सुझावों को स्वीकार किया गया। उनके विचारों को गंभीरता से लेते हुए भारत के विकास की नींव उनके आधार पर ही रखी गयी। 25 नवंबर 1949 संविधान निर्माण के तीसरे अधिवेशन में भी निरंतर दलितों और अछूतों को अधिकार दिलाने हेतु अपने विचारों को प्रस्तुत करते रहें। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को आरक्षण दिलवाने के श्रेय भी अम्बेडकर जी को ही जाता हैं। उनके इस कदम से दलितों को विकास की मुख्य धारा से जोड़ा जा रहा हैं।

निष्कर्ष Conclusion

भीमराव अंबेडकर (Bhimrao Ambedkar) एक ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन अछूतों और दलितों को उनके अधिकार दिलवाने में लगा दी। वह अपने प्रत्येक भाषण में सामाजिक बुराइयों को उजागर करते रहें और भारतीय संविधान का निर्माण कर उन्होंने अपने इस सपने को पूर्ण किया। जिसमें उन्होंने दलितों और अछूतों को समान अधिकार दिलवाए।

पर क्या यह पूर्णतः सत्य हैं अगर ऐसा सोचा जाए तो मेरा उत्तर ना होगा, क्योंकि आधुनिक युग में भी हमें कई ऐसी घटनाएं देखने को मिलती है, जो यह दर्शाती है कि आज भी लोगों को भेदभाव का सामना करना पड़ता है फिर चाहें वह दलित हो या स्वर्ण सभी भेदभाव के शिकार होते हैं।

दोस्तों, आज आपने भीमराव अंबेडकर (Bhimrao Ambedkar) की जीवनी एवं उनके कार्यो के संदर्भ में जाना। अब अंत के शब्दों में हम आपसे यही कहना चहिंगे कि अगर आपको हमारी यह पोस्ट अच्छी लगी हो तो इसे अपने मित्रों के साथ भी शेयर करें और इस पोस्ट से संबंधित अपने विचार प्रकट करने हेतु हमें नींचे कमेंट करें।

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2 COMMENTS

  1. बहुत ही अच्छी पोस्ट लगी । इससे मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला । Keep it doing
    😊

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