शिक्षण सूत्र – Maxims of Teaching in Hindi

शिक्षण सूत्र Maxims of Teaching वह तकनीक या शिक्षण योजना होती हैं जिसे अपनाकर एक शिक्षक अपने शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को प्रभावशाली बनाता हैं। शिक्षण में अध्यापक के सामने सबसे बड़ी समस्या यही रहती हैं कि वह किसी विषय का ज्ञान छात्रों को किस विधि से कराये। जिससे वह उस विषय को आसानी से छात्रों को समझा सकें।

हालांकि इसके लिए कई शिक्षण विधियां Teaching Methods पहले से हैं, किंतु फिर भी कई ऐसे उपयोगी शिक्षण सूत्र (Maxims of Teaching) जिसका उपयोग कर शिक्षण को और अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता हैं। इससे पहले हम आपको शिक्षण सिद्धांतो Principles of Teaching के बारे में बता चुके हैं जो शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में अत्यंत उपयोगी होती हैं।

maxims of teaching kya hai

इन सिद्धांतों के अलावा भी कई शिक्षाशास्त्रियों ने कुछ ऐसे शिक्षण सूत्रों का विकास किया हैं जिनसे किसी भी विषय-सामग्री को प्रभावी ढंग से छात्रों के सामने प्रस्तुत किया जा सकता हैं। तो चलिए जानते हैं कि वह कौन-कौन से शिक्षण सूत्र हैं जो शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं या जिनके एक शिक्षक अपने छात्रों में लागू कर सकता हैं। Maxims of Teaching in Hindi

शिक्षण सूत्र – Maxims of Teaching in Hindi

आज हम आपको कुछ प्रमुख शिक्षण सूत्रों को बताने वाले हैं जो आपको एक कुशक शिक्षक बनाने के लिए अत्यंत उपयोगी साबित हो सकते हैं –

1. ज्ञान से अज्ञात की ओर (From Known to Unknown) – ज्ञात से अज्ञात की ओर से आशय हैं कि एक शिक्षक को छात्रों को किसी नई विषय-वस्तु को पढ़ाने से पहले उस विषय – वस्तु को ऐसे टॉपिक से कनेक्ट कर लेना चाहिए। जिससे छात्र भली-भांति परिचित हो या जिस टॉपिक को छात्रों ने अपनी पुरानी कक्षा में पढ़ रखा हो।

यह सूत्र इसीलिए जरूरी हैं क्योंकि कोई भी छात्र जिस टॉपिक के बारे में बिल्कुल भी नही जानता उस विषय-वस्तु में कम रुचि लेता है। वहीं अगर शिक्षक उस टॉपिक को किसी ज्ञात टोपीक से जोड़के पढ़ाता हैं तो ऐसे में छात्र उस टॉपिक को अच्छे से समझ लेते हैं और रुचि भी लेते हैं। जिस कारण यह सूत्र अत्यंत उपयोगी हो जाता हैं।

2. सरल से जटिल की ओर (From Simple to Complex) – इस सूत्र के अनुसार छात्रों को पहले सरल बातों का ज्ञान करना चाहिए फिर कठिन बातों का। यह हमारी स्वभाविक प्रवृति हैं कि हम पहले सरल वस्तु को समझने का प्रयास करते हैं। बालको का मानसिक विकास धीरे-धीरे जिस क्रम में होता हैं उसी क्रम से उन्हें सरल से कठिन विषयों का ज्ञान कराना चाहिए।

3. पूर्ण से अंश की ओर (From Whole to Part) – इस सूत्र के अनुसार किसी वस्तु का प्रत्यक्षीकरण पहले पूर्ण रूप से करते हैं फिर उसके एक-एक अंग था, अर्थात पहले शिक्षक को चाहिए कि वह छात्रों को किसी पाठ की बेसिक इनफार्मेशन दे दे। तत्पश्चात उन टॉपिक के एक-एक बिंदुओं को विस्तृत रूप से समझाए।

4. स्थूल से सूक्ष्म की ओर (From Concrete to Abstract) – यह शिक्षण सूत्र Maxims of Teaching का महत्वपुर्ण अंग हैं। जैसा कि हमने आपको बताया कि बालक का मानसिक विकास धीरे-धीरे होता हैं, अर्थात वह पहले बड़ी-बड़ी चीजों चीजो को जानने और समझने में ही सक्षम होता हैं और फिर जैसे-जैसे उसका मानसिक विकास होते रहता हैं वैसे वैसे वह छोटी-छोटी चीजों को समझने लगता हैं और वस्तुओं के मध्य के भेद को समझने लगता हैं।

5. अनिश्चित से निश्चित की ओर (From Indefinite to Definite) – प्रारम्भ में बालको को किसी भी विषय का ज्ञान अनिश्चित रहता हैं। धीरे-धीरे जैसे-जैसे वह विकास को प्राप्त करते जाते हैं अनिश्चित ज्ञान निश्चित होता जाता हैं। जैसे प्रारम्भ में बच्चे सभी प्रकार के पक्षियों को एक ही नाम से पुकारते हैं। वे विभिन्न प्रकार के पक्षियों की भिन्नता को नही समझ पाते। लेकिन जैसे-जैसे उनकी आयु बढ़ती हैं वह पक्षियों के मध्य के भेदों को समझने में सक्षम जो जाते हैं। यह तकनीक का लाभ शिक्षक को अवश्य अपनी कक्षा में उठाना चाहिए।

6. विशिष्ट से सामान्य की ओर (From Particular to General) – इस सूत्र के अनुसार बालकों के सामने कई विशिष्ट उदाहरण प्रस्तुत कर उन्हें कोई सामान्य सिद्धांत निकालने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। इसी को दूसरे शब्दों में आगमन विधि (Inductive Method) कहते हैं। इसमें अध्यापक सर्वप्रथम छात्रों के सामने विभिन्न प्रकार का उदाहरण रखता हैं फिर इन उदाहरणों के आधार पर उन्हें कोई सामान्य सिद्धांत निकालने के लिए प्रोत्साहित करता हैं।

सामान्य शब्दो में कहें तो इस सूत्र के अनुसार शिक्षक को पहले उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए उसके बाद शिक्षक को पाठ का व्याख्यान (Explanation) करना चाहिए।

7. प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की ओर (From Seen to Unseen) – बालकों के सामने प्रत्यक्ष वस्तुओं के आधार पर ही अप्रत्यक्ष वस्तुओं का ज्ञान करना चाहिए। इस सूत्र के अनुसार बालको के पहले उनके सामने उपस्थित वस्तुओं का ज्ञान प्रदान करना चाहिए, उसके बाद उन वस्तुओं को जो उनके समक्ष नहीं हैं। सामान्य अर्थ यह हैं कि पहले छात्रों को वर्तमान का ज्ञान करवाना चाहिए, उसके बाद भूत और भविष्य।

8. मनोवैज्ञानिक क्रम से तरकात्मक क्रम की ओर (From Psychological to Logical) – वर्तमान शिक्षण-विधि पर मनोविज्ञान ने अपना पूर्ण अधिकार बना लिया हैं। यह बालक के व्यक्तित्व के सम्मान पर बल देता हैं। इसके अनुसार बालकों को कोई विषय, उनकी रुचि, आयु, जिज्ञासा-शारीरिक और मानसिक शक्ति को ध्यान में रखकर ही पढ़ाया जाए।

9. विश्लेषण से संश्लेषण की ओर (From Analysis to Synthesis) – हम पहले ‘पूर्ण से अंश की ओर’ के सूत्र के अनुसार सम्पूर्ण वस्तु पर छात्रों का ध्यान केंद्रित कर पुनः उसे विभिन्न भागों में विभाजित कर उसका विस्तृत अध्ययन करते हैं फिर ‘विश्लेषण से संश्लेषण की ओर’ वाले सूत्र के अनुसार विभिन्न भागों में सम्पूर्ण की ओर बढ़ते हैं।

10. अनुभूति से युक्ति-युक्त की ओर (From Empirical to Rational) – इस सूत्र के अनुसार विभिन्न साधनों द्वारा प्राप्त बालकों के ज्ञान को युक्तिसंगत बनाने का प्रयास करते रहना चाहिए। वास्तव में प्रारंभिक अवस्था मे बालक की मानसिक शक्ति इतनी तेज नहीं रहती कि वे जो कुछ ज्ञान प्राप्त करें जिसके विषय मे तार्किक तरीके से सोच भी ले।

जैसे छात्र प्रतिदिन सूर्य को उदित और अस्त होते देखते हैं। वे यह ज्ञान रखते है कि दिन के बाद रात और रात के बाद दिन आता हैं पर उनको इनका कारण नही मालूम होता है। पहले तो उन्हें कारण जानने की जिज्ञासा ही नहीं होती, पर मानसिक शक्ति बढ़ जाने पर उनके अंदर कारण जानने की जिज्ञासा उत्पन्न होने लगती हैं। शिक्षक का काम ऐसे ही ज्ञान का कारण बताकर युक्तिसंगत बनाना हैं।

निष्कर्ष – Conclusion

शिक्षण के सूत्रों (Maxims of Teaching) के अनुसार यदि कोई शिक्षक शिक्षण कार्य सम्पन्न करता हैं तो वहाँ के छात्र की शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया अधिक प्रभावशाली होती हैं और ऐसे में छात्रों का मानसिक और बौद्धिक विकास तीव्र गति से होता हैं। यह सभी सूत्र शिक्षण को प्रभावशाली बनाने हेतु अत्यंत महत्व्पूर्ण हैं। शिक्षक को चाहिए कि वह अपने शिक्षण के दौरान इन सूत्रों का अवश्य पालन करें।

तो दोस्तों आज आपने हमारी इस पोस्ट के माध्यम से जाना कि शिक्षण सूत्र क्या हैं और कौन-कौन से हैं? (Maxims of Teaching in Hindi) यदि आपको हमारी यह पोस्ट पसंद आई हो। तो पोस्ट को अपने दोस्तों के साथ भी अवश्य शेयर करें और अपने विचारों को हमसे शेयर करने के लिए कमेंट बॉक्स का उपयोग भी अवश्य करें।

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Pankaj Paliwal
नमस्कार दोस्तों मेरा नाम पंकज पालीवाल है, और मैं इस ब्लॉग का फाउंडर हूँ. मैंने एम.ए. राजनीति विज्ञान से किया हुआ है, एवं साथ मे बी.एड. भी किया है. अर्थात मुझे S.St. (Social Studies) से जुड़े तथ्यों का काफी ज्ञान है, और इस ज्ञान को पोस्ट के माध्य्म से आप लोगों के साथ साझा करना मुझे बहुत पसंद है. अगर आप S.St. से जुड़े प्रकरणों में रूचि रखते हैं, तो हमसे जुड़ने के लिए आप हमें सोशल मीडिया पर फॉलो कर सकते हैं।

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