कोहलबर्ग का नैतिक विकास का सिद्धांत |Kohlberg Theory of Moral Devlopment in Hindi

कोहलबर्ग का नैतिक विकास का सिद्धांत Kohlberg Theory पियाजे के नैतिक-मूल्यों के सिद्धांतों से प्रेरित था। कोहलबर्ग (1927-1987) अमेरिका के मनोवैज्ञानिक थे, जिनके द्वारा नैतिक-मूल्यों के विकास के सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया था।

इनके इन सिद्धांतो को शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया जाता हैं। इनके इन विचारों को मनोविज्ञान में उच्च स्थान दिया जाता हैं। कोहलबर्ग के अनुसार नैतिकता का कार्य छात्रो को सही और गलत के मध्य अंतर को स्पष्ट करना हैं।

छात्रों के जीवन हेतु क्या वस्तु या विचार नैतिक हैं या अनैतिक इसका निर्धारण नैतिक-मूल्यों के विकास द्वारा ही किया जाता हैं। इसलिए कोहलबर्ग के इस सिद्धांत को कोहलबर्ग का नैतिक विकास का सिद्धांत (Kohlberg Moral Devlopment Theory) के नाम से जाना जाता हैं।

कोहलबर्ग का नैतिक विकास का सिद्धांत |Kohlberg Theory of Moral Devlopment in Hindi

कोहलबर्ग का नैतिक विकास का सिद्धान्त पियाजे के सिद्धांत का संशोधित रूप था। उनके नैतिक विचार पियाजे के सिद्धांत से प्रभावित थे। कोहलबर्ग के अनुसार छात्रों मे नैतिकता का विकास जन्मजात नहीं बल्कि समाज द्वारा होता हैं। वह अपने सिद्धान्त द्वारा दिये गए 3 अवस्थाओं के 6 चरणों को सार्वभौमिक (Universal) मानते हैं।

कोहलबर्ग ने अपने नैतिक विकास के सिद्धान्त का प्रतिपादन वर्ष 1969 में किया एवं 1981 और 1984 में अपने विचारों में संशोधन का कार्य किया। कोहलबर्ग के अनुसार नैतिकता छात्रों के भावात्मक स्वरूप का अंग होती हैं। कोहलबर्ग अपने परीक्षण हेतु कथाओं का उपयोग करते थे। वह इन कथाओं के माध्यम से छात्रों से कुछ प्रश्न पूछते थे और उन प्रश्नों से प्राप्त उत्तरों के माध्यम से नैतिक विकास के सिद्धांतों का निर्माण करते थे।

उदाहरण – कोहलबर्ग की एक कथा जिसमें से प्रत्येक शिक्षक संबंधित परीक्षाओं में प्रश्न पूछे जाते हैं जो कि एक लघु कथा हैं वह इस प्रकार हैं- यूरोप की एक महिला जो कि बीमार थी जो मौत और जिंदगी के मध्य लड़ाई लड़ रही थी। उसके पति का नाम हिंज था। डॉक्टर के अनुसार एक रेडियम हैं जिससे इसकी जान बचाई जा सकती हैं।

उस समय उस रेडियम की खोज एक फार्मेसिस्ट ने की थी। उस दवाई का मूल्य बहुत अधिक था क्योंकि जिस फार्मेसिस्ट ने उसकी खोज की थी वह उस रेडियम के निर्माण में लगे धन से 10 गुना अधिक धन ले रहा था। जिस कारण उस औरत का पति हेंज उसे खरीद पाने में असमर्थ था।

एक दिन हेंज उस फार्मेसिस्ट के पास गया और उससे कुछ पैसे देकर कहा कि आप मुझे वो दवाई दे दीजिए में उससे अपनी पत्नी की जान बचा सकता हैं और आप कुछ पैसे रख लीजिए बाकी के पैसे में आपको बाद मे दे दूँगा परंतु उस फार्मेसिस्ट ने उसे साफ मना कर दिया और उससे कहा कि मैंने इस दवाई की खोज अधिक धन अर्जित करने के लिए की हैं।

आप मुझे जब तक इसका पूरा मूल्य नहीं चुकाएंगे मै तब तक आपको यह दवाई नहीं दूंगा। ये बात सुन हेंज को गुस्सा आ गया और उसने उसकी दुकान में तोड़-फोड़ कर उसके दुकान से उस रेडियम (दवाई) को चुरा लिया।

कोहल्बर्ग ने अपनी इस कथा के आधार पर दो प्रश्नों का निर्माण किया। जिसको उसने दो भागों में विभाजित किया। जो इस प्रकार हैं-

नैतिक दुविधा (Moral Dilemma) – कोहलबर्ग के अनुसार कभी-कभी हम सही और गलत के मध्य निर्णय लेने में जिन दुविधाओं या समस्याओं का सामना करते हैं उसे ही नैतिक दुविधा (Moral Dilemma) कहा जाता हैं। जैसे-

प्रश्न- अगर हिंज चोरी नहीं करेगा तो उसकी पत्नी मर जाएगी और अगर उसने चोरी की तो उसको पुलिस पकड़ कर जेल में बंद कर देगी।

नैतिक तर्कणा (Moral Reasoning) – दो विचारों के मध्य सही और गलत का चयन करना। जैसे-

प्रश्न- हिंज ने अपनी पत्नी की जान बचाने के लिए चोरी करने का फैसला लिया।

कोहलबर्ग ने अपने नैतिक विकास के सिद्धांत (Kohlberg Theory) का प्रतिपादन 3 अवस्थाओं में किया। जिसमें उन्होंने इन 3 अवस्थाओं को 6 चरणों में विभाजित किया हैं। जो इस प्रकार हैं-

Kohlberg Theory kya hain

पूर्व रूढ़िगत नैतिकता अवस्था (Pre Conventional Stage)

कोहलबर्ग के अनुसार नैतिक विकास की यह अवस्था 4 से 10 वर्ष तक चलती हैं। इस अवस्था में छात्रों का नैतिक विकास न के बराबर होता हैं, अर्थात बालक इस अवस्था में सही और गलत के मध्य अंतर को समझने में असमर्थ होते हैं।

इस आयु में छात्र सही और गलत का चयन दंड पाने का भय और पुरस्कार पाने की लालसा से करता है। कोहलबर्ग ने नैतिक विकास (Kohlberg Theory) की इस अवस्था को दो भागों में विभाजित किया हैं-

● दंड और आज्ञा का पालन (Punishment and Obedience) – इस प्रकार छात्र सही-गलत के मध्य के अंतर का चयन उनके प्रति दूसरे के व्यवहार के अनुसार करते हैं, अर्थात अगर वह गलत कार्य करते हैं तो उन्हें उनके घर वालो से दंड प्राप्त होता हैं और अगर वह कोई अच्छा काम करते हैं तो उन्हें किसी व्यक्ति के द्वारा पुरस्कार या तारीफ सुनने को मिलती हैं।

● आत्म अभिरुचि और प्रतिफल अभिमुकता (Self aptitude and reward attitude) – इस अवस्था मे छात्र अपनी रुचि के अनुसार आज्ञा का पालन करते हैं एवं वह कार्य अधिक करते हैं जिससे उन्हें उस कार्य को करने से अधिक फल प्राप्त हो सकें।

रूढ़िगत नैतिकता की अवस्था के (Conventional Stage)

कोहलबर्ग के अनुसार नैतिकता के विकास (Kohlberg Theory) का यह दूसरा चरण हैं जो कि 10 से 13 वर्ष तक चलती हैं। इसके अंतर्गत छात्र अधिक सामाजिक होते हैं, अर्थात वह ऐसे कार्य करते हैं जिससे समाज से उन्हें सम्मान प्राप्त हो सकें। इस आयु में छात्र दूसरे व्यक्तियों की नैतिकता के स्तर को अपने अंदर समाहित (अनुकरण) कर लेता हैं।

वह दूसरे व्यक्तियों के मानकों के अनुसार सही और गलत के मध्य अंतर को स्पष्ट कर उचित निर्णय ले पाता हैं। इस अवस्था को भी कोहलबर्ग ने 2 भागों में विभाजित किया हैं, जो इस प्रकार हैं-

● अच्छा लड़का या लड़की बनने की आशा (Hope to be a Good boy or Girl) – इस अवस्था में छात्र या छात्राओं में अच्छा बनने की होड़ होती हैं, अर्थात इस अवस्था में दूसरों से उन्हें सम्मान की आशा होती हैं। जिस कारण वह सदैव अच्छा लड़का या लड़की बनने के मार्ग की ओर अग्रसर होते हैं।

● कानून एवं व्यवस्था उन्मुखता (Law and Order Orientation) – इस अवस्था मे छात्र कानून,नियमों एवं नीतियों के प्रति सजक रहते हैं एवं समस्त नियमों एवं नीतियों का पालन करने की ओर अग्रसर होते हैं। इस आयु में वह नीति और नियमों की अवहेलना नहीं करते बल्कि उसे सत्य मानकर उसका पालन करते हैं।

उत्तर रूढ़िगत नैतिकता की अवस्था (Post Conventional Morality Stage)

कोहलबर्ग के अनुसार यह अवस्था 13 वर्ष से ऊपर के बालको की अवस्था होती हैं, यह नैतिकता की एक विकसित अवस्था हैं। जिसमें छात्र नैतिकता कस विकास में परिपक्व हो जाता हैं। इस अवस्था मे छात्र समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को प्रमुखता देने लगते हैं।

इस अवस्था को भी कोहलबर्ग 2 चरणों में विभाजित करते हैं जो कि इस प्रकार हैं-

● सामाजिक समझौते की अवस्था (Stage of Social Contract) – इस अवस्था में छात्र समाज के नीति-नियमों को अपनाने लगता हैं। समाज के प्रति अपने व्यक्तित्व एवं व्यवहार में उचित परिवर्तन करने लगता हैं। कोहलबर्ग के सिद्धांत (Kohlberg Theory) के इस चरण के अनुसार छात्र पूर्ण रूप से सामाजिक कार्यों के प्रति उत्तरदायित्वों को अपने अंदर समाहित करने लगता हैं।

● सार्वभौमिक या विवेक की अवस्था (Universal or Conscience Stage) – इस अवस्था में छात्र ऐसे मानकों का चयन करता हैं जो शाश्वत सत्य होते हैं, अर्थात जो प्रत्येक स्थिति में परिस्थिति के अनुकूल होते हैं।

इस अवस्था में छात्र अपने विवेक एवं आत्म-चिंतन की सहायता से सही और गलत के मध्य निर्णयों के चयन करता हैं। यह छात्र की परिपक्वता को दर्शाता हैं, इस स्तर में छात्र अपने चिंतन के अनुसार नीति-नियमों का पालन करने लगते हैं।

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कोहलबर्ग का नैतिक विकास का सिद्धांत की विशेषता (Characteristics of Kohlberg Theory of Moral Devlopment)

1. कोहलबर्ग अपने 6 चरणों को सार्वभौमिक सत्य का स्थान देते हैं।

2. इनके अनुसार छात्रों के नैतिक-मूल्यों का विकास समाज की सहायता से होता हैं।

3. कोहलबर्ग ने अपने इस सिद्धांत का प्रतिपादन 6 चरणों में विभाजित कर किया हैं।

4. इस सिद्धांत के अनुसार छात्र नैतिकता के आधार पर ही सही और गलत के मध्य अंतर को समझ पाते हैं।

5. कोहलबर्ग अपने परीक्षण के लिए कथाओं को माध्यम बनाकर प्रश्न करते हैं।

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निष्कर्ष Conclusion

कोहलबर्ग का नैतिक विकास का सिद्धांत (Kohlberg Theory of Moral Devlopment in Hindi) छात्रों के नैतिक विकास पर बल देता अर्थात उन्हें यह निर्णय लेने में सहायता करता हैं कि उनके लिए क्या उचित एवं अनुचित हैं। यह सिद्धांत सत्य और असत्य के मध्य के अंतर को स्पष्ट करने का कार्य करता हैं।

तो दोस्तों आज आपने इस पोस्ट के माध्यम से जाना कि कोहलबर्ग का सिद्धांत (Kohlberg Theory in Hindi) क्या हैं? अगर आपको हमारी यह पोस्ट पसंद आई हो तो इसे अपने अन्य प्रियजनों एवं मित्रों के साथ भी अवश्य शेयर करें।

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